बागेश्वर। पर्वतीय अंचलों में सूखते प्राकृतिक जल स्रोतों और घटते भूजल स्तर की गंभीर चुनौती के बीच बागेश्वर जनपद में जल संरक्षण को लेकर एक प्रेरणादायी पहल सामने आई है। पर्वतीय अरण्य सेवा एवं विकास संस्थान बागेश्वर द्वारा अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, बेंगलुरु के सहयोग से संचालित “सामुदायिक उत्तरदायी स्प्रिंगशेड प्रबंधन परियोजना” के अंतर्गत काण्डा क्षेत्र के विद्यालयों में “हमारे नौले-धारे और उनके संरक्षण के लिए मेरा प्रयास” विषय पर व्यापक जागरूकता गोष्ठियों का आयोजन किया गया। कार्यक्रमों में छात्र-छात्राओं को जल स्रोतों के संरक्षण, संवर्धन और पारंपरिक जल संस्कृति के महत्व से अवगत कराया गया।
परियोजना के तहत राजकीय इंटर कॉलेज काण्डा, जीजीआईसी काण्डा, जीआईसी बाजीरौठ, जीआईसी सानिउडियार तथा इंटर कॉलेज विजयपुर सहित विभिन्न विद्यालयों में आयोजित गोष्ठियों में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई। संस्थान अध्यक्ष पंकज कुमार काण्डपाल ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि जनसहभागिता से जुड़ा सामाजिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक एवं पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से ही प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है और इसके लिए नई पीढ़ी की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि परियोजना के अंतर्गत काण्डा क्षेत्र के छह गांवों—भदौरा, बाछीरौठी, हथरशीला, सीमकुना, भाटगाड़ और बलगढ़ी—में मनरेगा एवं जनसहभागिता के माध्यम से जल संरक्षण संबंधी कार्य संचालित किए जा रहे हैं। इन क्षेत्रों में पारंपरिक नौलों और धारों के संरक्षण के साथ जल संचयन की वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया जा रहा है, जिससे भविष्य में पेयजल संकट को कम किया जा सके।
परियोजना प्रबंधक ललित काकड़ी ने बताया कि संस्था पिछले पंद्रह वर्षों से क्षेत्र में पचास से अधिक पेयजल योजनाओं पर कार्य कर चुकी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान परियोजना का उद्देश्य केवल जल स्रोतों का संरक्षण नहीं, बल्कि समाज में जल के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना भी है। इसी उद्देश्य से विद्यालयों में सूचना, शिक्षा एवं संचार माध्यमों के जरिए विद्यार्थियों के बीच जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान जीआईएस एवं तकनीकी विशेषज्ञ लक्ष्मी गोस्वामी ने विद्यार्थियों को हाइड्रोलॉजी तथा आधुनिक जीआईएस तकनीक के माध्यम से जल स्रोतों के अध्ययन और संरक्षण की प्रक्रिया की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक जल संग्रहण क्षेत्रों की पहचान कर आगामी वर्षों के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई है, जिसे जनसहभागिता के साथ क्रियान्वित किया जाएगा।
वहीं स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी के विशेषज्ञ उमेश बिष्ट ने विद्यार्थियों को भूजल भंडारण, जल चक्र और जल संरक्षण के व्यावहारिक उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे अपने गांवों और आसपास के जल स्रोतों की रक्षा को जनआंदोलन का रूप दें।
गोष्ठियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत भी किया गया। पूरे आयोजन के दौरान यह संदेश प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि यदि आज प्राकृतिक जल स्रोतों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
हमारे नौले-धारे बचेंगे तो भविष्य बचेगा
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